आज सांझ फिर विदाई ले रही हैं
दो कदम चल के
दो कदम ढल रही हैं
ढलती उम्र सी
शाम जा रही हैं
बुढ़ापे में आती झुर्रियों सी
सवेरे घर से निकले
पंछी भी घर को जा
रहे हैं
मनमर्ज़ी करके
छलांगे लगा
फुर्र से उड़ते हुए
पहाड़ो की गोद में
ढलता सूरज
जैसे माँ की गोद में
सोता शिशु
इत्मीनान से