प्रकृति की छाव में

सुबह सुबह उगते सूरज को देख के जो मेरे मन के भाव बदलते हैं ना

अल्फ़ाज़ हैं ही नहीं उस खो जाने वाले अनुभव के लिए, उफ्फ

उसे तो सिर्फ महसूस किया जा सकता है उसी पल में ठहर के

और यकायक जिंदगी खूबसूरत लगने लगती हैं

फिर इक बार जी उठने को मन करता हैं

और इक गहरी निशब्दता छा जाती हैं
मन मस्तिष्क पे

ध्यानमग्न हो जाने को जी चाहता है जिंदगी भर के लिए

बस निहारती रहूं प्रकृति को यूंही हर लम्हा

बेइंतहा खूबसूरती को समेटे हुए है ये खुद में

-इक सुबह सैर करते बुना गया शब्दों का ताना बाना

Published by Poetess

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