हर रोज

हर रोज

मैं जीवन की सच्चाई से रूबरू होता हूँ

कितने अपनों को पाता हूँ

कितने अपनों को खोता हूँ

सिर्फ मैं ही जानता हूँ

जताता नहीं

बस जीता हूँ

जीवन की सार्थकता सिद्ध करने को

खुद को ज़िंदगी तक जिन्दा रखने को

Published by Poetess

Writing is love.

3 thoughts on “हर रोज

  1. वाह!! बिल्कुल सही बात है,
    आप की कविताओं में बहुत अच्छी और गहरी बाते होती है 👍🏻👍🏻💕

    Liked by 1 person

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