कभी किसी पहर

कभी किसी पहर मैंं सितारो के बीच चमकती सी दिख जाऊं तो

आश्चर्य न करे,

कई अँधेरी रातों से गुजरा हैं ये सफ़र मेरा

कभी मैं कंचन सी चमक,

महक किसी लता सी पा जाऊं तो

आश्चर्य न करे,

आग की तपन सह के निखारा हैं खुद को

इस रूप में ढाला हैं खुद को

Published by Poetess

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6 thoughts on “कभी किसी पहर

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