रातो पे मेरी नींंद उधार अभी काफ़ी हैं
के तेरे शहर में शाम अभी बाकी हैं
गुलाबी सर्दी का गुलाबी एहसास भी आना बाकी हैं
तेरा भरी भीड़ में यूँ अचानक टकरा के मिल जाना भी बाकी हैं
रात की तन्हाई का दस्तूर भी अभी जारी हैं
ज़िन्दगी की पनघट पे जमगट का होना अभी बाकी हैं
शहर की वीरान गलियों का खिलना भी बाकी हैं
रूठे हुए लोगो की नाराज़गी भी अभी काफ़ी हैं
तेरे शहर में चाँद का निकलना अभी बाकी हैं
के यूं मुस्कुरा के मेरा खिल उठना भी अभी बाकी हैंं
तेरे शहर में शाम अभी काफ़ी हैं
