चहुँओर फैले उजियारा हर घर मंगलमय हर द्वार पे दस्तक दे खुशहाली कुछ यूं हो हर दीवाली
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मन की बाते
हृदय के प्रथम से अन्तिम छोर तक की इक इच्छा हैं मुस्कानें फैलाने की सच्चे मायने में किसी के जीवन में परिवर्तन लाने की, फिर उस खुशी को खुद में ही जी लेने की बिन किसी को बताये, दुनिया से परे
मेरी ख़्वाहिश
शहर में चौतरफा भीड़ नही पसंद थोड़ी रफ्तार भी कम हो शहर की गाड़ियो का हुजूम भी कम काश सितारोंं सी सजी इमारते साथ में इक छोटा सा हरा भरा जंगल भी रखती सड़के थोड़ी कम भीड़ भाड़ सी होती रंग बिरंगी साईकिलो से सजी होती हर किसी को जल्दबाज़ी इतनी ना होती जाने कीContinue reading “मेरी ख़्वाहिश”
स्वछंद प्रेम
प्रेम को ना छीना जाता हैं ना ही तंज कसे जाते हैं उसे जीने दिया जाता हैं “स्वछंद”
मैं मुसाफ़िर हूं
मैं मुसाफ़िर हूं, मुझे चलने मैं मज़ा आता हैं मुकम्मल होना मेरी ख़्वाहिशों में हैं ही नहीं, मेरा सुकून मेरे सफ़र में हैं, मंज़िल में नहीं
शाम अभी काफ़ी हैं
रातो पे मेरी नींंद उधार अभी काफ़ी हैं के तेरे शहर में शाम अभी बाकी हैं गुलाबी सर्दी का गुलाबी एहसास भी आना बाकी हैं तेरा भरी भीड़ में यूँ अचानक टकरा के मिल जाना भी बाकी हैं रात की तन्हाई का दस्तूर भी अभी जारी हैं ज़िन्दगी की पनघट पे जमगट का होना अभीContinue reading “शाम अभी काफ़ी हैं”
कभी किसी पहर
कभी किसी पहर मैंं सितारो के बीच चमकती सी दिख जाऊं तो आश्चर्य न करे, कई अँधेरी रातों से गुजरा हैं ये सफ़र मेरा कभी मैं कंचन सी चमक, महक किसी लता सी पा जाऊं तो आश्चर्य न करे, आग की तपन सह के निखारा हैं खुद को इस रूप में ढाला हैं खुद को
हर रोज
हर रोज मैं जीवन की सच्चाई से रूबरू होता हूँ कितने अपनों को पाता हूँ कितने अपनों को खोता हूँ सिर्फ मैं ही जानता हूँ जताता नहीं बस जीता हूँ जीवन की सार्थकता सिद्ध करने को खुद को ज़िंदगी तक जिन्दा रखने को
जीवन
देखो इक इक लम्हे में कैसे जीवन जा रहा हैं गुजरता ही जा रहा हैं कभी लौट के ना आने के लिए
मै खुद सा होना चाहता हूँ
मैं खुद सा रहना चाहता हूँ खुद सा बनना चाहता हूँ हर इक शख्स सुनार सा बन मुझ पे नक्काशी कर अपनी पारखी नजरो में ढालना चाहता हैं, निखारना चाहता हैं ये परेशानी का सबब बनता हैं मैं खुद को ही जीना चाहता हूँ मैं खुद में ही जीना चाहता हूँ