कुछ बाते, कुछ यादें

आज फिर चाँद की हल्की हल्की सी झलक खिड़की से आ रही हैं, होले होले जैसे चाँद का उजियारा लोरी गा रहा हो, कुछ सुना रहा हो रात को रोशन बना रहा हो जैसे , कायनात की खूबसूरती बढ़ा रहा हो जैसे, होले होले से कुछ गुनगुना रहा हो जैसे।

कुछ पल प्रकृति की छांव में

आज चाँद कुछ उजला उजला हैं धीमी धीमी सी हवा दूर कही ठहरे ठहरे से चाँद सितारे कितने खूबसूरत है नजारे

अभी मेरा आना बाकी हैं

अभी मेरा तेरे शहर से कुछ वास्ता बाकी हैं अभी मेरा लौट के घर को आना भी बाकी हैं ख़्वाबो ख्याल का आना जाना भी बाकी हैं जुस्तुजू भी बेहद हैं, इसमें हद आना अभी बाकी हैं मेरे लिए मेरा होना ही काफ़ी हैं के तेरे शहर से मेरा वास्ता अभी बाकी हैं

खुद का साथ

दुनिया उगते हुये सूरज को ही सलाम करती हैं करेगी पर सूरज को अस्त भी होना होता हैं प्रकृति का नियम हैं फिर नयी सुबह आती हैं, फिर से सूर्योदय होता हैं दुनिया को रोशन करने तो जब कोई ना हो साथ तो खुद को खुद सलाम करे याद रखे के इसके बाद फिर सेContinue reading “खुद का साथ”

ये जो तुम

ये जो तुम हाथ बांधे खडे़ हो किसी याद में खड़े हो या ताक में या ज़िंदगी की लम्बी सी कतार में या जीने की कवायद में या खाली खाली किसी आशियाने की पुरानी दीवार पे लिखे अल्फ़ाज़ में गुम या किसी की भूली बिसरी मीठी याद में बोलो कब तक हैं ये हाथो काContinue reading “ये जो तुम”

मैं ख़्वाब में हूँ

ज़िंदगी की हक़ीक़त धुंधली हैं मैं ख़्वाब में हूँ ये सुहावना सा हैं हक़ीक़त चुभती तीर सी ख़्वाब चांद सी ठंड़क लिए हक़ीक़त धूप सी तपती तेज इसलिए मैं ख़्वाब हो गयी हक़ीक़त कही खो गई

तुम ख़्वाब सी

तुम ख़्वाब सी रात के किसी पहर सी बात के किसी राज सी सुबह की मीठी नींद सी कभी हमसफ़र, कभी हमदर्द सी कभी वजह, कभी बेवजह सी कभी आँखो की नमी सी कभी धूप की तपिश सी कही थोड़ी, कही ज्यादा कुछ मुझमें, कुछ ज़िन्दगी में बसती हों कभी हक़ीक़त, कभी ख़्वाब बन के

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