ज़िंदगी की चाहते

मैनें प्रेम को कभी पाना नही चाहा बस दिल से चाहा। इसकी खूबसूरती को जिया। खुश हूँ अब खुद के साथ भी किसी के भी साथ खुश रहने का जज़्बा लिये।

स्वछंद प्रेम

प्रेम को ना छीना जाता हैं ना ही तंज कसे जाते हैं उसे जीने दिया जाता हैं “स्वछंद”

मैं मुसाफ़िर हूं

मैं मुसाफ़िर हूं, मुझे चलने मैं मज़ा आता हैं मुकम्मल होना मेरी ख़्वाहिशों में हैं ही नहीं, मेरा सुकून मेरे सफ़र में हैं, मंज़िल में नहीं

शाम अभी काफ़ी हैं

रातो पे मेरी नींंद उधार अभी काफ़ी हैं के तेरे शहर में शाम अभी बाकी हैं गुलाबी सर्दी का गुलाबी एहसास भी आना बाकी हैं तेरा भरी भीड़ में यूँ अचानक टकरा के मिल जाना भी बाकी हैं रात की तन्हाई का दस्तूर भी अभी जारी हैं ज़िन्दगी की पनघट पे जमगट का होना अभीContinue reading “शाम अभी काफ़ी हैं”

कभी किसी पहर

कभी किसी पहर मैंं सितारो के बीच चमकती सी दिख जाऊं तो आश्चर्य न करे, कई अँधेरी रातों से गुजरा हैं ये सफ़र मेरा कभी मैं कंचन सी चमक, महक किसी लता सी पा जाऊं तो आश्चर्य न करे, आग की तपन सह के निखारा हैं खुद को इस रूप में ढाला हैं खुद को

मै खुद सा होना चाहता हूँ

मैं खुद सा रहना चाहता हूँ खुद सा बनना चाहता हूँ हर इक शख्स सुनार सा बन मुझ पे नक्काशी कर अपनी पारखी नजरो में ढालना चाहता हैं, निखारना चाहता हैं ये परेशानी का सबब बनता हैं मैं खुद को ही जीना चाहता हूँ मैं खुद में ही जीना चाहता हूँ

कुछ पल प्रकृति की छांव में

आज चाँद कुछ उजला उजला हैं धीमी धीमी सी हवा दूर कही ठहरे ठहरे से चाँद सितारे कितने खूबसूरत है नजारे

अभी मेरा आना बाकी हैं

अभी मेरा तेरे शहर से कुछ वास्ता बाकी हैं अभी मेरा लौट के घर को आना भी बाकी हैं ख़्वाबो ख्याल का आना जाना भी बाकी हैं जुस्तुजू भी बेहद हैं, इसमें हद आना अभी बाकी हैं मेरे लिए मेरा होना ही काफ़ी हैं के तेरे शहर से मेरा वास्ता अभी बाकी हैं

Design a site like this with WordPress.com
Get started