इत्तेफाकन जाना हुआ, अब हर एक अन्जाना मोड़ जाना पहचाना हुआ।बेफिक्री से फ़िक्र तक दो बहने हमसाया की तरह साथ….उस अनजाने से शहर में दो अजनबियों से आमना-सामना हुआ वे ‘अमृत’ जैसे रहे हमारी उस यात्रा में…हमारे साथ हमारे दिल में ख़ुशी भी और शुक्रगुज़ार होने का एहसास भी…यादें कुछ खट्टी भी हैं तो मिठासContinue reading “आगरा यात्रा और ताजमहल की याद”
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ढलती शाम
आज सांझ फिर विदाई ले रही हैंदो कदम चल केदो कदम ढल रही हैंढलती उम्र सीशाम जा रही हैंबुढ़ापे में आती झुर्रियों सीसवेरे घर से निकलेपंछी भी घर को जारहे हैंमनमर्ज़ी करकेछलांगे लगाफुर्र से उड़ते हुएपहाड़ो की गोद मेंढलता सूरजजैसे माँ की गोद मेंसोता शिशुइत्मीनान से