इक पल

इक पल जो हाथ से छूट गया लौट के आ ना सकेगा वो जो पीछे छूट गया चलो आगे की सुध लेते हैं आज को मुकम्मल करते हैं आज को कुछ इस तरह से जीते हैं

आत्म-प्रेम

मैं खुद से किसी नन्हे बालक सी मोहब्बत करता हूँ किसी गलती पर इक झिड़की भी यकीन मानो ये सर्वोत्तम हैं

ज़िंदगी के पहर

ज़िंदगी के चारो पहर बीत रहे हैं ज़िंदगी पल पल में जा रही हैं हम जीते जा रहे हैं, आगे की सुध में सब पीछे छोड़ते जा रहे हैं

शुभकामनाएँ

चहुँओर फैले उजियारा हर घर मंगलमय हर द्वार पे दस्तक दे खुशहाली कुछ यूं हो हर दीवाली

मन की बाते

हृदय के प्रथम से अन्तिम छोर तक की इक इच्छा हैं मुस्कानें फैलाने की सच्चे मायने में किसी के जीवन में परिवर्तन लाने की, फिर उस खुशी को खुद में ही जी लेने की बिन किसी को बताये, दुनिया से परे

मेरी ख़्वाहिश

शहर में चौतरफा भीड़ नही पसंद थोड़ी रफ्तार भी कम हो शहर की गाड़ियो का हुजूम भी कम काश सितारोंं सी सजी इमारते साथ में इक छोटा सा हरा भरा जंगल भी रखती सड़के थोड़ी कम भीड़ भाड़ सी होती रंग बिरंगी साईकिलो से सजी होती हर किसी को जल्दबाज़ी इतनी ना होती जाने कीContinue reading “मेरी ख़्वाहिश”

स्वछंद प्रेम

प्रेम को ना छीना जाता हैं ना ही तंज कसे जाते हैं उसे जीने दिया जाता हैं “स्वछंद”

मैं मुसाफ़िर हूं

मैं मुसाफ़िर हूं, मुझे चलने मैं मज़ा आता हैं मुकम्मल होना मेरी ख़्वाहिशों में हैं ही नहीं, मेरा सुकून मेरे सफ़र में हैं, मंज़िल में नहीं

शाम अभी काफ़ी हैं

रातो पे मेरी नींंद उधार अभी काफ़ी हैं के तेरे शहर में शाम अभी बाकी हैं गुलाबी सर्दी का गुलाबी एहसास भी आना बाकी हैं तेरा भरी भीड़ में यूँ अचानक टकरा के मिल जाना भी बाकी हैं रात की तन्हाई का दस्तूर भी अभी जारी हैं ज़िन्दगी की पनघट पे जमगट का होना अभीContinue reading “शाम अभी काफ़ी हैं”

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