मैं डर से डरता हूँ मैं डर में अब यकीन नही रखता मैं खुद पे अब यकीन करता हूँ
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दोस्ती
कितना निभाया कितना साथ छोड़ दिया दोस्ती इस आधार पर बनती हैं चलती हैं
मेरा लेखन
मेरे लिए इक आखर लिखना बड़ी बात और मैं कवितायें लिखती हूँ जाने कैसे ये संभव है असंभव सा
सौगात ए ज़िंदगी
ज़िंदगी को तो बीत जाना ही होगा मुझे भी खुश रहना ही होगा यादें मुझे यादगार चाहिए ज़िंदगी से ये सौगात चाहिए दिन दो चार और चाहिए जीने के लिए
खूबसूरत अनुभूति
सबसे सुन्दर लगता हैं विचारों का यकायक मन में आ जाना और लिख देना
मन की बाते
हृदय के प्रथम से अन्तिम छोर तक की इक इच्छा हैं मुस्कानें फैलाने की सच्चे मायने में किसी के जीवन में परिवर्तन लाने की, फिर उस खुशी को खुद में ही जी लेने की बिन किसी को बताये, दुनिया से परे