यादें

यादें दस्तक देती हैं जाडे़ में नरम धूप की तरह ओस की नमी की तरह हल्की सी ठंडक लिए आँखों में बहते नीर सी खुशियों में लम्बी मुस्कान की तरह

ख्वाब में

मेरे ख्वाबों में तुम रहते हो तुम सोते नही जागते रहते हो परवाने हो शमा को बुझने नही देते हो

आत्म-प्रेम

मैं खुद से किसी नन्हे बालक सी मोहब्बत करता हूँ किसी गलती पर इक झिड़की भी यकीन मानो ये सर्वोत्तम हैं

शाम अभी काफ़ी हैं

रातो पे मेरी नींंद उधार अभी काफ़ी हैं के तेरे शहर में शाम अभी बाकी हैं गुलाबी सर्दी का गुलाबी एहसास भी आना बाकी हैं तेरा भरी भीड़ में यूँ अचानक टकरा के मिल जाना भी बाकी हैं रात की तन्हाई का दस्तूर भी अभी जारी हैं ज़िन्दगी की पनघट पे जमगट का होना अभीContinue reading “शाम अभी काफ़ी हैं”

हर रोज

हर रोज मैं जीवन की सच्चाई से रूबरू होता हूँ कितने अपनों को पाता हूँ कितने अपनों को खोता हूँ सिर्फ मैं ही जानता हूँ जताता नहीं बस जीता हूँ जीवन की सार्थकता सिद्ध करने को खुद को ज़िंदगी तक जिन्दा रखने को

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