प्रेम का शुद्ध रुप वो ही जिसे पाया ना जा सका जो आज भी बाकी हैं आपमें
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शुभकामनाएँ
चहुँओर फैले उजियारा हर घर मंगलमय हर द्वार पे दस्तक दे खुशहाली कुछ यूं हो हर दीवाली
शाम अभी काफ़ी हैं
रातो पे मेरी नींंद उधार अभी काफ़ी हैं के तेरे शहर में शाम अभी बाकी हैं गुलाबी सर्दी का गुलाबी एहसास भी आना बाकी हैं तेरा भरी भीड़ में यूँ अचानक टकरा के मिल जाना भी बाकी हैं रात की तन्हाई का दस्तूर भी अभी जारी हैं ज़िन्दगी की पनघट पे जमगट का होना अभीContinue reading “शाम अभी काफ़ी हैं”