मेरी ख़्वाहिश

शहर में चौतरफा भीड़ नही पसंद थोड़ी रफ्तार भी कम हो शहर की गाड़ियो का हुजूम भी कम काश सितारोंं सी सजी इमारते साथ में इक छोटा सा हरा भरा जंगल भी रखती सड़के थोड़ी कम भीड़ भाड़ सी होती रंग बिरंगी साईकिलो से सजी होती हर किसी को जल्दबाज़ी इतनी ना होती जाने कीContinue reading “मेरी ख़्वाहिश”

कभी किसी पहर

कभी किसी पहर मैंं सितारो के बीच चमकती सी दिख जाऊं तो आश्चर्य न करे, कई अँधेरी रातों से गुजरा हैं ये सफ़र मेरा कभी मैं कंचन सी चमक, महक किसी लता सी पा जाऊं तो आश्चर्य न करे, आग की तपन सह के निखारा हैं खुद को इस रूप में ढाला हैं खुद को

मै खुद सा होना चाहता हूँ

मैं खुद सा रहना चाहता हूँ खुद सा बनना चाहता हूँ हर इक शख्स सुनार सा बन मुझ पे नक्काशी कर अपनी पारखी नजरो में ढालना चाहता हैं, निखारना चाहता हैं ये परेशानी का सबब बनता हैं मैं खुद को ही जीना चाहता हूँ मैं खुद में ही जीना चाहता हूँ

वक्त की बात, कुछ रफ्तार

हमारे पास दिन हैं रात हैं मिनट हैं सेकंड हैं घंटे हैं आज़ादी हैं वो ही काफी हैं फिर वक्त की कमी कहा वक्त ही वक्त हैं जहाँ भी देखो वहाँ

ये जो तुम

ये जो तुम हाथ बांधे खडे़ हो किसी याद में खड़े हो या ताक में या ज़िंदगी की लम्बी सी कतार में या जीने की कवायद में या खाली खाली किसी आशियाने की पुरानी दीवार पे लिखे अल्फ़ाज़ में गुम या किसी की भूली बिसरी मीठी याद में बोलो कब तक हैं ये हाथो काContinue reading “ये जो तुम”

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