इत्तेफाकन जाना हुआ, अब हर एक अन्जाना मोड़ जाना पहचाना हुआ।
बेफिक्री से फ़िक्र तक दो बहने हमसाया की तरह साथ….
उस अनजाने से शहर में दो अजनबियों से आमना-सामना हुआ वे ‘अमृत’ जैसे रहे हमारी उस यात्रा में…
हमारे साथ हमारे दिल में ख़ुशी भी और शुक्रगुज़ार होने का एहसास भी…
यादें कुछ खट्टी भी हैं तो मिठास उनके साथ होने का भी हैं….
और उस बेमिसाल दोस्ती का भी जो निरंतर चलती रहेगी सालो साल,
ताज़ नगरी की याद दिलाती रहेगी…
सच कुछ इत्तेफाक से मिले हुए अजनबी, जो अपनेपन की डो़र को आपके दिल से बांध देते हैं….
जो बहुत मज़बूत बना देती हैं, आपको भी आपकी हिम्मत को भी…
अब तो हमारी सहयात्रा चलती रहेगी जीवन पर्यन्त….यूंही हंसी की खिलखिलाहट गूंजती रहेगी हमारे दरमिया…..
और हम यूँही अमृतपान करते रहेंगे इस ख़ुशी का जो हमे “अमृता जी” के होने का एहसास दिलाता रहेगा…..जीवन में…
- आगरा यात्रा में मिले एक खूबसूरत दोस्त की फरमाइश पे लिखा गया।